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बिहार के मुजफ्फरपुर की रहने वाली राजकुमारी देवी ने अपने बुलंद हौसले के दम पर न सिर्फ सामाजिक बंधनों का विरोध किया, बल्कि बिहार के ‘किसान चाची’ ने अपनी मेहनत से बड़ी संख्या में महिलाओं की तकदीर को भी बदलने का काम किया. बता दे की इसके साथ साथ समाज के अन्य महिला किसानों के लिए एक उदाहरण बनी उन्होंने महिलाओं के जीवन को बदलने का काम किया है इसके साथ बिहार के ‘किसान चाची’ के साथ साथ 50 अन्य महिला किसानों की सफलता की कहानी को सुनेंगे और उनके अनुभव से सीखेंगे।

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आपको बता दे की बिहार के किसान चाची का असली नाम राजकुमारी देवी है वह बिहार के मुजफ्फरपुर जिले से ताल्लुक रखती हैं बिहार के ‘किसान चाची’ आज सफलता के मुकाम पर हैं पर एक समय ऐसा भी था जब उन्होंने गरीबी और तंगहाली में अपना जीवन गुजारा था कभी वह 150 रुपए से काम सुरु किया था. आपको बता दे की इस सफर को तय करने के लिए बिहार के ‘किसान चाची’ को काफी सामाजिक और पारिवारिक बाधाओं का सामना करना पड़ा, जहां एक वक्त पराए तो दूर अपनों ने भी उन्हें अकेला छोड़ दिया था. लेकिन बिहार के ‘किसान चाची’ ने हार नहीं मानी. उन्होंने सामाजिक बंधन की खिलाफत करते हुए अपने जमीन पर खेती करने का निश्चय किया और समाज व परिवार के सारे लोगों के विरोध के बाद भी वो निरंतर आगे बढ़ती रहीं.

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बताया जा रहा है की वर्ष बिहार के किसान चाची 1990 में परंपरागत तरीके से खेती करते हुए वैज्ञनिक तरीके को अपनाकर अपनी खेती-बाड़ी को उन्नत किया. इसके बाद बिहार के ‘किसान चाची’ ने अचार बनाने की शुरुआत की. साल 2000 से उन्होंने घर से ही अचार बनाना शुरू किया जो आज बिहार के ‘किसान चाची’ की अचार के नाम से पूरे देश में प्रसिद्ध हैं. बताया जा रहा है की जब 1983 में उनकी एक बेटी हुई तो ससुराल वालों ने बेटा ना हो पाने के कारण उन्हें खूब भला बुरा सुनाया फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और अपने पति के साथ खेती करना शुरू कर दिया खेती में उचित सफलता ना मिल पाने के कारण उन्होंने आचार मुरब्बा बनाना शुरू किया अपने इस व्यवसाय में उन्होंने कई वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जिसके बाद उन्हें सफलता मिलना शुरू हुआ।

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बताते चले की बिहार के किसान चाची इस क्षेत्र में अपने पहल और योगदान के लिए उन्हें कई बार सामाजिक संगठनों, बिहार और केंद्र सरकार से भी समान्नित किया गया. वर्ष 2019 में उन्हें पद्मश्री सम्मान भी मिला. पद्मश्री राजकुमारी देवी (किसान चाची) ने बताया, ‘वर्ष 1990 में खेती करना शुरू किए फिर वर्ष 2000 से ब्लॉक में ट्रेनिंग हुआ तो हमने देखा कि कम पैसे में तो अचार बनाना ही बेहतर होगा इसलिए हम अचार बनाने के लिए ट्रेनिंग लिए. इसके बाद ‘ज्योति जीविका’ स्वयं सहायता समूह बनाकर 160 महिलाओं को जोड़ा और घर पर ही महिलाओं को काम मिलने लगा.’

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